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लाल रेत के कण — Free royalty-free folk music for YouTube, streaming, podcasts. Duration 3:07. No attribution required.
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Male vocalist, powerful and intimate, storyteller, no intro, vocals start within the first second, drops directly into the main theme, folk music style, farewell mood, acoustic guitar, fingerpicking, intimate and raw, emotional storytelling, professional studio production, clear vocals, high quality mastering, Indian Folk Ballad, Emotional, Nostalgic, Hindi Pop
Lyrics
[Chorus]
धूल उड़ी, चुनर लहराई,
जाता पल, दादी की विदाई।
रेल चली, दिल रोया,
सूना हुआ ये स्टेशन सारा।
[Verse]
दोपहर की धूप सुनहरी,
जयपुर जंक्शन की पगडंडी।
हाथों में थी गरम जलेबी,
रगों में बहती यादें गहरी।
दादाजी की तस्वीर सताए,
दादी माँ को घर जाना था।
[Pre-Chorus]
ठंडी हवा का झोंका आया,
सफेद दुपट्टे को उड़ाया।
एक पल को सब थम सा गया,
जब इंजन ने सीटी बजाया।
[Chorus]
धूल उड़ी, चुनर लहराई,
जाता पल, दादी की विदाई।
रेल चली, दिल रोया,
सूना हुआ ये स्टेशन सारा।
[Verse]
रेल के डिब्बे हरे पुराने,
भाप की सीटी, शोर मचे।
छोटे-छोटे थे मेरे पैर,
माँ का हाथ था मेरे सर पे।
दीदी ने वो रिपोर्ट लपेट,
जलेबी गरमा-गरम दी।
[Pre-Chorus]
ठंडी हवा का झोंका आया,
सफेद दुपट्टे को उड़ाया।
एक पल को सब थम सा गया,
जब इंजन ने सीटी बजाया।
[Chorus]
धूल उड़ी, चुनर लहराई,
जाता पल, दादी की विदाई।
रेल चली, दिल रोया,
सूना हुआ ये स्टेशन सारा।
[Bridge]
छोटे-छोटे हाथों से,
मैंने वो हलकी सी भेंट दी।
आँखों में थी नमी,
पर होंठों पे मुस्कान थी।
वो बिछड़ने का मंज़र,
आज भी है दिल में बसा।
[Verse]
ट्रेन चली, खिड़की से देखा,
हाथ हिलाती दादी माँ।
धीरे-धीरे दूर हुई,
जैसे कोई सपना हो।
मैं वहीं खड़ी रह गई,
देखती रह गई बस।
[Chorus]
धूल उड़ी, चुनर लहराई,
जाता पल, दादी की विदाई।
रेल चली, दिल रोया,
सूना हुआ ये स्टेशन सारा।
[Outro]
मेरे कुर्ते के नीचे,
लाल रेत के कण चिपक गए।
Track Details
| Genre | folk |
| Mood | farewell |
| Scene | — |
| Primary Instrument | male |
| Voice Type | male |
| Duration | 3:07 |
| File Size | 5MB |
| Language | 🇮🇳 हिन्दी |
| Lyrics | ✓ Available |
| Created | 2026-05-21 |